तत्कालीन कलेक्टर व सांसद प्रतिनिधि के निर्देशों को जिला कार्यक्रम अधिकारी ने बताया धत्ता, 12 माह बीतने को है लेकिन नए समूहों का नहीं किया अनुबंध, पुराने से ही लिया जा रहा भर्राशाही पूर्वक मनमाने कार्य


*कोरबा:-* रेडी टू ईट का संचालन करने वाले जिले भर के समूहो का अनुबंध गत जुलाई 2020 में समाप्त हो चुका है लेकिन जिला कार्यक्रम अधिकारी आनंद किस्पोट्टा अभी भी उन्ही समूहों से भर्राशाही पूर्वक मनमाने काम ले रहे है। जबकि जिले की तत्कालीन कलेक्टर श्रीमती किरण कौशल द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान जिले भर में नए समूहों के चयन की प्रक्रिया अतिशीघ्र पूर्ण कर जानकारी से अवगत कराने निर्देश भी दिए गए थे लेकिन उनके अन्यंत्र स्थानांतरण के साथ ही उनके निर्देश को भी जिला कार्यक्रम अधिकारी ने हवा में उड़ा दिया। यहां तक कि जनप्रतिनिधियों का निर्देश भी उक्त अधिकारी के लिए कोई मायने नही रखता क्योंकि कोरबा सांसद प्रतिनिधि एवं प्रदेश कांग्रेस के संयुक्त महासचिव प्रशांत मिश्रा द्वारा भी उन्हें फोन के माध्यम से पुराने समूह को यथाशीघ्र हटाकर नए समूह का चयन किये जाने निर्देशित किये गए थे किंतु लगता है कि साहब को खुद की मनमर्जी से काम करना अच्छा लगता है। प्रतिमाह विभाग से सस्ते दर पर प्रदाय गेहूं और बाजार से खरीदे जाने वाले खादय पदार्थों के बिलों में समूहों से जो घालमेल कराया जाता है उसमें हर माह लंबा- चौड़ा खेल हो रहा है और यही वजह है कि रेडी टू ईट संचालन की जिम्मेदारी से पुराने समूहों को अबतक हटाया नही गया है। सूत्रों द्वारा बताया जाता है कि कुछ नेतानुमा लोगों ने अधिकारी से सांठगांठ कर अपना- अपना सेक्टर बांट रखा है जहां कमीशन शुल्क के आधार पर जिले भर के 80 से भी अधिक पुराने समूहों से ही रेडी टू ईट निर्माण का काम कराया जा रहा है जिसमे तय समूहों द्वारा नेता बनाम ठेकेदारों के इशारे पर माहवार बिलिंग में जमकर घालमेल किया जाता है। और इस प्रकार जिले भर में हर माह आधा करोड़ से ज्यादा का बंदरबांट हो रहा है।

*जनप्रतिनिधियों को भी मॉनिटरिंग की फुर्सत नही*
दरअसल सरकार द्वारा महिला बाल विकास के माध्यम से नौनिहालों, गर्भवती एवं शिशुवती माताओं को पौष्टिक आहार निर्माण एवं वितरण का जिम्मा महिला स्व. सहायता समूह को सौंपा गया है लेकिन उन समूहों में अप्रत्यक्ष रूप से नेतानुमा लोगों का दखल रहता है और वे ही समूह की आड़ में रेडी टू ईट का संचालन करते हुए बड़ी कमाई करते है जिसमे जिले में बैठे महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों, पर्यवेक्षकों और परियोजना अधिकारियों के साथ घालमेल रहता है। यह सब पूर्ववर्ती शासन के दौरान से देखने को मिल रहा है जिसमे कोई बदलाव नही दिख रहा है बल्कि वर्तमान में अनियमितता और भी बढ़ गई है। रेडी टू ईट कार्यक्रम में हर माह कितना राशि मंजूर होता है और वास्तव में कितना खर्च होता है तथा गर्भवती, शिशुवती व बच्चों को शासन के द्वारा बनाए गए नियमों के तहत पौष्टिक आहार मिल रहा या नही इसे देखने की किसी जनप्रतिनिधि को फुर्सत नही, ना ही किसी ने जमहत उठाई।

*कमीशनखोरी से पौष्टिक आहार के सही संचालन पर लगा ग्रहण*
नियमानुसार रेडी टू ईट निर्माण के लिए निर्माणकर्ता समूह का अनुबंध 5 वर्ष तक का रहता है जहां बीते भाजपा शासन काल में जिले भर में समूहों का चयन हुआ था किंतु शासन बदल गया लेकिन दुर्भाग्य कि अनुबंध समाप्त होने के बाद भी समूह अबतक नही बदले जा सके और पुराने समूहों से ही कमिशन ढर्रे पर जमकर भर्राशाही पूर्वक काम लिया जा रहा है। अब यदि कोई समूह भारी- भरकम कमीशन देकर रेडी टू ईट का काम करता है तो वह भला कितनी इमानदारी से गर्भवती व शिशुवती तथा बच्चों को पौष्टिक खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराएगा..? और इस प्रकार रेडी टू ईट का संचालन करने व कराने में बड़ा खेल हो रहा है और इसमें पर्दे के पीछे संगठित ठेकेदारनुमा नेता काम कर रहे है। विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी की इसमें सहमति और संलिप्तता ना हो यह संभव नही माना जा सकता क्योंकि समूह के चयन प्रक्रिया की जवाबदारी जिला कार्यक्रम अधिकारी के पास होता है। ऐसे में पुराने समूह से ही काम लेना तो संदेह के दायरे में आएगा ही और उंगली भी उठेगी। लिहाजा रेडी टू ईट का जलवा- जलाल और समूहों से कमाई की चर्चा इन दिनों महिला बाल विकास विभाग में सिर चढ़कर बोल रहा है जिसमे जिला कार्यक्रम अधिकारी के भूमिका को लेकर भी तरह- तरह की चर्चा हो रही है।

*95 प्रतिशत समूहों का खाद्य विभाग से जारी अनुज्ञा पत्र की अवधि समाप्त*
महिला स्व. सहायता समूह को रेडी टू ईट संचालन के लिए खाद्य विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है जिसका खाद्य विभाग द्वारा अनुज्ञा पत्र जारी किया जाता है व जिसकी अवधि एक वर्ष की रहती है तथा जिसका नियमानुसार हर वर्ष नवीनीकरण कराया जाना रहता है लेकिन गत वर्ष जुलाई में जिले के सभी समूह का रेडी टू ईट निर्माण अनुबंध समाप्त होने के बाद लगभग 95 प्रतिशत समूह ने अपने अनुज्ञा पत्र का नवीनीकरण ही नही कराया है और पूरा काम कमीशनखोरी के सहारे चल रहा है। महिला बाल विकास तो अंधेर नगरी- चौपट राजा की तर्ज पर काम कर ही रहा है लेकिन खाद्य विभाग के नौकरशाह भी शायद कुम्भकर्णीय निद्रा में सो रहे है। ऐसे में रेडी टू ईट निर्माणकर्ता समूह के किसी चूक से यदि पोषण आहार सेवन करने वाले बच्चों के सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तो उसका जिम्मेदार आखिर कौन होगा..?

*पोषण आहार के कार्य मे अधिकारी, समूह व ठेकेदार हो रहे पोषण से लबालब*
राज्य शासन द्वारा रेडी टू ईट निर्माणकर्ता समूह को बेहद सस्ते दर पर गेहूं प्रदाय किया जाता है एवं समूहों द्वारा सोयाबीन, चना, मूंगफली, रागी, शक्कर और तेल बाजार से खरीदना रहता है जिसे हर मंगलवार को प्रत्येक सेंटर में मिक्सिंग करने का काम किया जाना रहता है। नियम तो यह भी है कि इन सारे वस्तुओं को मिलाकर बनाए जाने वाले पौष्टिक आहार को जिस पॉलिथीन में रखा जाता है उसमें क्वालिटी की गारंटी सहित पैकिंग तिथि आदि का भी विवरण लिखा जाना रहता है जिसे हर सप्ताह तैयार करना होता है। जानकारी के मुताबिक ज्यादातर सेंटरों में माह में सिर्फ एक बार गेहूं और शक्कर मात्र से पौष्टिक आहार तैयार किया जाता है और सप्ताह के मंगलवार वितरण दिवस को जितना वितरण किया जाना रहता है उतने पैकेट में कुछ दिन पूर्व का पैकिंग तिथि दर्शाते हुए गर्भवती, शिशुवती महिलाओं और बच्चों को पोषण आहार बताकर वितरण कर दिया जाता है तथा जो शेष बच जाता है उन्हें अन्य मंगलवार वितरण के लिए रख दिया जाता है। इस प्रकार पूरे एक माह का पोषण आहार एक ही बार मे तैयार कर वितरण दिवस के दिन खेल किया जाता है। शायद ही ऐसा कुछेक सेंटर होगा जहां समूह द्वारा इमानदारी पूर्वक शासन के निर्देशानुसार उन तमाम सामग्री का मिक्सिंग कर पौष्टिक आहार तैयार किया जाता हो। क्वालिटी के नाम पर ऐसा छलावा कटघोरा, पोड़ी- उपरोड़ा, पसान एवं पाली परियोजना में ज्यादा चल रहा है जहाँ शासन से गेहूं का आबंटन तो अधिक हुआ है किंतु रिकार्ड में कम पाया जा रहा है जिसे सेंटर में जाकर अवलोकन किया जा सकता है। वहीं हर सेंटर में महिलाओं और बच्चों की दर्ज संख्या के हिसाब से पौष्टिक आहार वितरण करना तो बताया जाता है लेकिन जरूरी नहीं है कि प्रत्येक सेंटर में शत प्रतिशत उपस्थिति दर्ज हो। कई सेंटरों से तो पौष्टिक आहार के पॉलिथीन वापस भी कर दिए जाते हैं लेकिन बिल दर्ज संख्या का पूरा बनाया जाता है। रेडी टू ईट के माध्यम से जिले भर में कितने बच्चों और कितनी गर्भवती एवं शिशुवती महिलाओं को सही पौष्टिक आहार मिल रहा है यह तो पता नहीं लेकिन इसके माध्यम से अधिकांश समूह वाले और संबंधित जिले के अधिकारी, पर्यवेक्षक, परियोजना अधिकारी व ठेकेदार जरूर पोषण से लबालब हो गए हैं ।

*बेमानी साबित हो रहा कुपोषण मुक्त स्वस्थ कोरबा का सपना*

महिला बाल विकास विभाग में नौनिहालों, गर्भवती एवं शिशुवती माताओं व किशोरी बालिकाओं के लिए राज्य शासन द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं में भर्राशाही कोरबा जिले में आम बात हो चला है। बीते सप्ताह जिला प्रशासन ने जिले में कुपोषण का पैमाना जानने के लिए वजन त्योहार की शुरुआत की थी और बड़े- बड़े जनप्रतिनिधियों ने जोरशोर के साथ वजन त्योहार का शुभारंभ किया था लेकिन उसमें भी महिला बाल विकास के अधिकारियों ने औपचारिकता मात्र निभाया और कुपोषित बच्चों में सुधार कितना प्रतिशत हुआ इसका खुलासा नही किया गया। डीएमएफ फंड से प्रबल योजना भी संचालित किया जा रहा था, ताकि जिले में कुपोषण का प्रतिशत कम हो सके। स्वस्थ कोरबा योजना कितना फलीभूत हुई इसकी भी जानकारी सार्वजनिक नही की गई। इतना तो जरूर है कि कुपोषित बच्चों का वजन बढ़े न बढ़े अधिकारियों और रेडी टू ईट के ठेकेदारों की जेबों का वजन जरूर बढ़ रहा है। ऐसे में कुपोषण मुक्त स्वस्थ कोरबा का सपना बेमानी साबित हो रहा है।

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